12 September 2019

वो आठ साल

By अन्विति सिंह

स्कूली शिक्षा के पायदानों में प्रारंभिक शिक्षा, जिसके अंतर्गत कक्षा एक से लेकर कक्षा आठवीं तक की विद्यालयी शिक्षा आती है , एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण पायदान है | यही वजह है की केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें , बच्चों को इस दौरान  मूलभूत सुवधाएं देने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं  | शिक्षक, कक्षा, किताबों के साथ ही साथ  पोषण ,(मिड डे मील ),  यूनिफार्म और विभिन्न प्रकार के वजीफे दने की योजनाएं भी लागू की गई हैं | निस्संदेह  शिक्षा के  क्षेत्र में इन योजनाओं से क्रांतिकारी परिवर्तन  आए  हैं और बहुत बड़ी संख्या में बच्चे इनसे लाभान्वित हुए हैं | लेकिन अब सवाल ये है की क्या केवल इंफ्रास्ट्रक्चर ठीक कर देने से हमारा उद्देश्य पूरा हो जायेगा ? 

मूलतः शिक्षा की अहमियत इसलिए है की उसे सामाजिक बदलाव के हथियार के रूप में देखा जाता है | एक शिक्षित समाज उन्नति की  ओर अग्रसर रहता है | सामाजिक समस्याओं से मुक्ति  दिलाता है |  एक विचारवान, प्रगतिशील सोच का नागरिक ही हमारी सबसे बड़ी जरुरत है | जिसकी नींव प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही रखी जा सकती  है| 

मूलतः शिक्षा की अहमियत इसलिए है की उसे सामाजिक बदलाव के हथियार के रूप में देखा जाता है | एक शिक्षित समाज उन्नति की  ओर अग्रसर रहता है | सामाजिक समस्याओं से मुक्ति  दिलाता है |  एक विचारवान, प्रगतिशील सोच का नागरिक ही हमारी सबसे बड़ी जरुरत है | जिसकी नींव प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही रखी जा सकती  है|  इसके लिए ईंट पत्थर से बने क्लासरूम्स के साथ ही साथ उनमें एक ऐसे स्वस्थ और सहज परिवेश का निर्माण करने की जरुरत है जहाँ बच्चे उन्मुक्त होकर हर रोज कुछ नया सीखें और अपना सर्वश्रेष्ठ 'स्व' हासिल करने में सक्षम हों | 

ध्यान देने योग्य है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम ने भारतीय कक्षाओं के स्वरुप को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है | आयु अनुरूप और वर्ष भर चलने वाले नामांकन प्रक्रिया के कारण जहाँ बच्चों को बहुत लाभ पंहुचा है वहीं शिक्षकों के सामने नई चुनौतियों के द्वार खुल गए  हैं | एक ही कक्षा में विभिन्न शैक्षिक स्तर के बच्चों को पढ़ाने की चुनौती के साथ ही उनके दक्षता स्तर को कक्षा के अनुरूप करने की चुनौती भी उनके सामने है | इसके साथ ही प्रशासनिक और शैक्षिक स्तर की उनकी अपनी समस्याएं अलग | इन सबके बीच उनसे ये अपेक्षा की जाती है कि  वे बच्चों को सीखने सिखाने के लिए एक सहज और रोचक परिवेश का निर्माण करने में सक्षम होंगे | 

6  से 14  वर्ष की उम्र के ये बच्चे प्रारंभिक शिक्षा के दौरान बाल्यावस्था  से किशोरावस्था की तरफ कदम बढ़ा रहे होते हैं | अपने परिवेश से परिचित होते हुए ये वृहत्तर समाज का भी अर्थ ग्रहण कर रहे होते हैं |

इस पूरी शैक्षिक प्रक्रिया का दूसरा पहलू है बच्चे | 6  से 14  वर्ष की उम्र के ये बच्चे प्रारंभिक शिक्षा के दौरान बाल्यावस्था  से किशोरावस्था की तरफ कदम बढ़ा रहे होते हैं | अपने परिवेश से परिचित होते हुए ये वृहत्तर समाज का भी अर्थ ग्रहण कर रहे होते हैं | सामाजिक मान्यताओं, रूढ़ियों और परम्पराओं से सामंजस्य बनाते हुए अपनी क्षमताओं को भी टटोल रहे होते हैं | विभिन्न शोध बताते हैं की इन्ही वर्षों के दौरान बच्चों को गहन शैक्षिक निर्देशन की जरुरत पड़ती है खासकर के वंचित  तबके से आए  बच्चों और प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थियों को | शोध ने इस तथ्य को भी बार बार रेखांकित किया है कि  यही सबसे उपयुक्त समय होता है जब उनके अंदर  सामाजिक कुरीतियों और रूढ़ियों के प्रति जागरूकता ला जा सकती है और संवैधानिक मूल्यों के बीज बोए जा सकते हैं | 

हमारे स्कूलों के मौजूदा हालात खासकर के सरकारी स्कूलों के,  शिक्षकों को अपनी ज़िम्मेदारी पूरी  तरह से निभाने में समर्थ नहीं कर पाते | ऐसे में कुछ नए प्रयोग करने की जरुरत है जो हमारे शिक्षकों को सशक्त कर सके और उनकी मदद कर सके और इसमें टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जा सकता है | इसी सोच को ध्यान में रख कर सम्पर्क फाउंडेशन टेक्नोलॉजी आधारित प्रयोगों के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर सुधार लाने का प्रयास कर रहा है |