09 August 2019

शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है

शैलेश परसाई (R) बच्चों के साथ
By शैलेश परसाई

शिक्षा सीखने की एक प्रक्रिया है। यह किसी भी वस्तु या परिस्थिति को आसानी से समझने, किसी भी तरह की समस्या से निपटने और पूरे जीवन भर विभिन्न आयामों में संतुलन बनाए रखने में हमारी सहायता करती है। शिक्षा सभी मनुष्यों का सबसे पहला और सबसे आवश्यक अधिकार है। शिक्षा हमें अपने जीवन में एक लक्ष्य निर्धारित करने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। यह हमारे ज्ञान, कुशलता, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व में सुधार कर सामाजिक विकास, आर्थिक वृद्धि और तकनीकी उन्नति का रास्ता प्रशस्त करती है।

भारत जनसंख्या के दृष्टिकोण से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। वहीं पर शिक्षा के मामले में भी सबसे बड़ी अशिक्षित जनसख्या भी यहीं निवास करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश ने जहाँ आर्थिक विकास किया, वही शिक्षा के मामले में भी बहुत प्रगति की, परंतु जितनी तेजी से विकास होना चाहिए था या जितनी गति से साक्षरता दर बढ़नी चाहिए थी, उतनी नहीं बढ़ी। केन्द्र और राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर सबको शिक्षित और साक्षर बनाने के लिए कई प्रकार के प्रयास किए। यह स्पष्ट है कि शिक्षा वह अंधकार मिटाने का सशक्त माध्यम है जिससे व्यक्ति, परिवार तथा समाज का बहुमुखी विकास होता है। 

भारत के संविधान मे 6 - 14 साल तक की उम्र के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य और निशुल्क की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है। इस दिशा में सन् 2002 में 86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया। इससे देश के हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने का मूलभूत अधिकार प्राप्त हो गया। इससे शिक्षा के प्रति जहाँ लोगों में नई चेतना जाग्रत हुई, वहीं पर राज्यों को प्रत्येक बच्चे को शिक्षा देना अनिवार्य हो गया है। 

आजादी के कई वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी सरकारी प्राथमिक स्कूलों में न तो शिक्षा का स्तर सुधर पा रहा है और न ही इनमें विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाएं मिल पा रही हैं। देश की एक बड़ी आबादी सरकारी स्कूलों के ही भरोसे है। फिर वे चाहे कैसे भी क्यों न हों। इन स्कूलों में न तो योग्य अध्यापक हैं और न ही मूलभूत सुविधाएं। 

कुछ रिपोर्टों के अनुसार कक्षा चार या पांच के बच्चे अपने से निचली कक्षा की किताबें नहीं पढ़ पाते। सामान्य गणितीय संक्रियाएं यथा जोड़-घटाना, गुणा-भाग आदि उन्हें नहीं आता। बड़े-बड़े अफसर और ऐसे सरकारी कर्मचारी जिनकी आर्थिक स्थिति बेहतर है, अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं। अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने की अनिवार्यता न होने से ही सरकारी स्कूलों की दुर्दशा इस प्रकार हुई है। जब इन अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते, तो उनका इन स्कूलों से कोई सीधा लगाव भी नहीं होता एवं वे इन स्कूलों की ओर ध्यान नहीं देते।

हमें यह समझना होगा कि शिक्षा की गुणवता से आशय यह नहीं कि शिक्षक महज रोचक तरीके से शिक्षण करे, अपितु शाला भवन, पुस्तकालय और खेल का मैदान, शिक्षकों का प्रशिक्षण, बैठने के लिये पर्याप्त जगह, शिक्षक विद्यार्थी अनुपात, पर्याप्त शौचालय (बालक-बालिका के लिये पृथक-पृथक) आदि व कुछ और बातें यथा शिक्षकों का व्यवहार व सामाजिक समरसता में कमी आदि ऐसी बाते हैं जो कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण में कमी के प्रमुख कारक हैं। वास्तव में सरकारी विद्यालयों को केवल धन आवंटन और ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं होगा। प्राथमिक शिक्षा में सुधार के लिए संपूर्ण व्यवस्था की खामियों का पूर्णरूपेण निरीक्षण कर उसमें आमूलचूल सुधार व नियमन की आवश्यकता है। 

बचपन अमूल्य है और यह जीवन के कुछ प्रारम्भिक वर्षों के लिए ही प्राप्त होता है, इसलिए स्कूल बस्ते का भार कम रखकर बच्चों को बचपन का आनंद लेने व सामाजिक विकास करने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए। 

“कर्तव्यों का बोध कराती और अधिकारों का ज्ञान,
शिक्षा से ही मिल सकता हैं, सर्वोपरि सम्मान”