20 September 2019

मेक इन इंडिया और कौशलपरक शिक्षा

By अन्विति सिंह

मेक इन इंडिया के इस दौर में जब स्किल इंडिया का नारा जोर शोर से लगाया जा रहा है और सरकार भी उद्यमिता को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है, क्या हमारी स्कूली शिक्षा इसके लिए जरूरी कौशलों, क्षमताओं, और दक्षताओ को बच्चों में विकसित करने पर जोर दे रही है? रोजगारोन्मुख और भविष्योन्मुख शिक्षा ही वर्तमान समय की जरूरत है।

रोजगारोन्मुख शिक्षा से तात्पर्य ऐसी शिक्षा से है जो ना सिर्फ रोजगार हासिल करने लायक व्यक्ति बनाए बल्कि रोजगार उत्पन्न करने वाले व्यक्ति का निर्माण करे जो एक चिंतनशील, कल्पनाशील, भविष्य के प्रति सचेत नागरिक हो और आसन्न मुश्किलों को आंक कर उन्हें दूर करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। 

 इक्कीसवीं सदी में ऐसे उद्यमी नागरिकों का निर्माण करना जो समय की जरूरत समझें, आनेवाली समस्याओं के प्रति सचेत रहें और उनका सामना करने के लिए तैयार रहें, शिक्षा प्रणाली की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है।

इस पृष्ठभूमि में सर्जनात्मकता, प्रभावी संवाद करने की योग्यता, नेतृत्व क्षमता, आलोचनात्मक दृष्टिकोण जैसी कुछ महत्वपूर्ण क्षमताओं और कौशलों का बच्चों में प्राथमिक स्तर से ही बीजारोपण करना आवश्यक हो जाता है।  

अब भी हमारी शिक्षा प्रणाली रटने और परीक्षा में उन रटे हुए अवधारणाओं को लिख देने पर ही जोर देती है। बच्चों को प्रश्न पूछने, विचार विमर्श और बहस करने के लिए मौके ना के बराबर ही मिलते हैं

यह सच है कि पिछले दशक से  शिक्षा के क्षेत्र में लगातार हमने बहुत सी सफलताएं हासिल  की हैं। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005), शिक्षा का अधिकार अधिनियम से लेकर नई शिक्षानीति प्रारूप तक, कुछ महत्वपूर्ण मुकाम हमने हासिल किए हैं। परंतु सरसरी निगाह पर देश की प्राथमिक शिक्षा की स्थिति का अवलोकन करने पर ही यह तथ्य ज़ाहिर हो जाता है कि अभी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। अब भी हमारी शिक्षा प्रणाली रटने और परीक्षा में उन रटे हुए अवधारणाओं को लिख देने पर ही जोर देती है। बच्चों को प्रश्न पूछने, विचार विमर्श और बहस करने के लिए मौके ना के बराबर ही मिलते हैं। सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं को दूर करने की बजाय उन्हें पुष्ट और पोषित ही किया जा रहा है। ऐसे में मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे अभियान कहाँ तक सफल होंगें इस पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह उठ खड़ा होता है। 

समय की मांग है कि शिक्षक स्वयं इन  सभी के प्रति सचेत हों और आगे बढ़कर शिक्षा व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने का प्रयास करें। माना कि राह में रोड़े बहुत हैं और मंज़िल दूर.... परंतु कदम तो बढ़ाया ही जा सकता है। शिक्षक आगे बढ़कर आएंगे  तो उनकी सहायता करने के लिए बहुत लोग अपना हाथ आगे बढ़ाएंगे। जिनमें से एक सम्पर्क फाउंडेशन भी है।  सम्पर्क फाउंडेशन भी हर तरह से शिक्षकों को सशक्त करने  के लिए प्रयासरत है।