23 September 2019

एक संघर्ष यह भी

By स्पार्क सुखविंदर कौर

मेरा जन्म हिमाचल प्रदेश के सोलन के पास एक छोटे से शहर स्वारघाट में हुआ था | मेरे माता पिता मुझसे बेहद प्यार करते थे और मैं उनसे| मुझे स्कूल जाना और उसके परिसर में खेलना बहुत पसंद था | अगर कुछ नहीं अच्छा लगता था तो वह था गृहकार्य जो अन्य  बच्चों की तरह मुझे भी हर रोज  मिलता था | उस वक्त मैं उन समस्त सामाजिक भेदभावों के प्रति अनभिज्ञ थी जिनका सामना हमारे समाज की लड़कियों को आज भी करना पड़ता है | लेकिन  यह स्थिति लंबे समय  तक  नहीं रही |

जब मैं थोड़ी बड़ी हुई तो मैंने देखा की मेरे हमउम्र सारे लड़के स्कूल जा रहे हैं जबकि मैं घर बैठने के लिए मजबूर की जा रही हूँ |  मैंने अपनी पढाई पूरी करने की जिद की तो घर के बड़े बुजुर्गों ने ये कहकर मुझे रोकने का प्रयास किया कि  लड़कियों को अधिक पढ़ाई -लिखाई  करने की कोई जरुरत नहीं , बल्कि उन्हें तो घर के काम काज में मन लगाना चाहिए |

पर पता नहीं कैसे, शायद ज़िन्दगी के संघर्षों की देन थी, मेरी माँ शिक्षा के महत्त्व को जानती थीं | उन्होंने हिम्मत दिखाई और मेरे पिता से मेरी पढ़ाई  के बारे में बात की | उन्होंने पिता को राजी कर लिया कि  वे दादाजी- जिनका निर्णय सर्वोपरि होता था -से मेरी पढ़ाई  के बारे में बात करें |

दादाजी को मनाने में पिता को कई दिन लग गए | अंततः बहुत सी शर्तों के साथ उन्होंने मुझे पढाई पूरी करने की अनुमति दे दी और बिना किसी रुकावट के मेरी स्कूली शिक्षा पूरी हो गई | मेरी महत्वाकांक्षा बढ़ गई थी और अब मैं कॉलेज जाना चाहती थी | पर इस बार मेरे माता पिता ने मेरा साथ देने से मना कर दिया | सच कहूं तो उनके पास इतने पैसे ही नहीं थे कि  वे मुझे कॉलेज भेजने के  बारे में सोचते | फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी | मैं अपनी माँ के साथ गाँव की उस लड़की से मिलने गई जो कॉलेज में पढ़ रही थी | मकसद कॉलेज की फीस का पता लगाना था | मेरे घर से नजदीकी कॉलेज 30 किलोमीटर दूर था | सरकारी कॉलेज होने की वजह से उसकी फीस अधिक नहीं थी , मेरे पिता को भी लगा कि  इतना खर्च तो वह उठा ही सकते हैं | मैंने भी उनका हाथ बंटाने के लिए गाँव के बच्चों को ट्यूशन  पढ़ाना शुरू कर दिया | जल्द ही मैं एक लोकप्रिय टीचर बन गई और इतना कमाने लगी कि अपने छोटे भाई बहनों को भी पढ़ा सकूँ |

स्नातक की पढाई पूरी करते ही मुझे डेवेलपमेंट सेक्टर में नौकरी मिली | शुरू में तो मेरा सारा ध्यान  सिर्फ वेतन पर था | लेकिन काम के दौरान मेरी मुलाकात ऐसी कई लड़कियों से हुई जिन्हे उन्ही बाधाओं और समस्याओं का सामना करना पड़  रहा था जिन सबसे निकलकर मैं आई थी | तब मुझे महसूस हुआ कि हमारे समाज में लड़कियों की शिक्षा अभी भी वर्जित है | मैंने फैसला किया कि  मुझे इनके लिए कुछ करना है| इस सोच के साथ मैंने शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर बनाने का निर्णय लिया | मैं समाज में बदलाव लाना चाहती थी | मैं चाहती थी की लोग अपनी लड़कियों को स्कूल भेजने और उन्हें शिक्षित करने के महत्त्व के बारे में जाने | 

शिक्षा ने मुझे बहुत कुछ दिया है | आत्मविश्वास, स्वतंत्रता, ज्ञान, विचारों की स्पष्टता , उचित परिप्रेक्ष्य में चीज़ों को देखने की काबिलियत, अन्याय और भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाने की ताकत, अपने संस्कृति और मूल्यों का सम्मान करने की कला | आज मैं  एक स्वतंत्र सोचवाली महिला हूँ जो अपने  नियम गढ़ने में सक्षम हैं |  मैं बस लड़कियों को पढ़ने के लिए ,शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित करना चाहती हूँ | मुझे पूरा विश्वास है कि  ऐसा दिन जरूर आएगा जब न केवल मेरे गाँव बल्कि भारत के प्रत्येक गाँव के व्यक्ति शिक्षा के महत्त्व  समझेंगे|  मैं प्रसिद्ध अफ़्रीकी कहावत पर विश्वास करती हूँ कि ,"‘यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं, तो आप एक व्‍यक्ति को शिक्षित करते हैं, लेकिन यदि आप एक महिला को शिक्षित करते हैं, तो आप पूरे परिवार को शिक्षित करते हैं।’