30 September 2019

शिक्षा ही मेरा मज़हब

फ़ैज़ी अलीम बच्चो के साथ
By स्पार्क फ़ैज़ी अलीम

मेरा जन्म 1988 में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के मुस्लिम परिवार में हुआ। हम जॉइंट फैमिली में रहा करते थे और हमारे खानदान के सारे लोग  रूढ़ीवादी सोच के थे। शिक्षा का अभाव था और उस दौरान मेरठ शहर में हिंदू मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक तनाव  अपने चरम पर  था | आए दिन कर्फ्यू लगते रहते थे । नौबत यहां तक आ जाती थी कि  हेलीकॉप्टर द्वारा खाना फेंका  जाता था ।

मैं बहुत छोटा था और डब्बे का दूध पिया  करता था ,बहुत मुश्किल से  पिताजी मेरे  लिए  दूध की व्यवस्था कर पाते  थे। उस समय हिंदुओं में  मुस्लिमों के प्रति एवं मुस्लिमों में  हिंदुओं के प्रति  नफरत भरी हुई थी |कारण बस एक ही  था –शिक्षा का अभाव । कई साल तक ये सब चलता रहा । मुझे थोड़ी समझ आने लगी थी और हिन्दू और मुसलमानो के बीच बढ़ती इस महज़बी फसाद का मुझ पर भी प्रभाव पड़ा । 

एक दिन मैं अपने पिताजी के बसों के कारखाने में गया हुआ था|  एक बस में शिव जी की मूर्ति देखकर मैं बिफर गया | मेरे पिताजी ने जब मुझे यह करते देखा तो गहरी सोच में पड़ गए|  उन्होंने मेरे नाना को खत लिखकर इस घटना के बारे में बताया ,तब मेरे नाना ने तुरंत ही मेरठ छोड़कर बरेली शिफ्ट होने को कहा। मैं तीन साल का था जब पिताजी  हमें लेकर  बरेली शिफ्ट हो गए और वहां मेरा दाखिला हार्टमैन कॉलेज में हुआ जो  बरेली का सर्वश्रेष्ठ स्कूल था | 

मेरी शिक्षा ने मुझे स्वामी विवेकानंद एवं अब्दुल कलाम जैसे दिग्गजों  से परिचित  कराया | मैं उन्ही के बताये रास्तों पर चलते हुए आगे बढ़ना चाहता हूं और समाज में फैली हुई नफरतों को मिटाकर  अमन का बीज बोना चाहता हूं ताकि फिर कोई 2 साल का बच्चा सांप्रदायिक वैमनस्य का शिकार न हो |

वहां मैंने जाना कैसे सब हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में प्यार मोहब्बत से रहते थे |  जो मुझमें बचपन में नफरत भरी थी वह कहीं ना कहीं हटने लगी और मेरे हिंदू मित्र भी बनते चले गए । स्कूल के  प्रधानाचार्य फादर रिचर्ड पिंटू और मेरी शिक्षिका सिस्टर सिंप्रोस ने मुझे सोशल क्लब का हिस्सा बनाया और जिसके तहत वे हमें बस्तियों में गरीब बच्चों को पढ़ाने लेकर जाते थे। मैंने जाना की कैसे मज़हबी मुद्दों से ज्यादा  जरूरी होते हैं सामाजिक मुद्दे | शिक्षा की कमी, गरीबी , बेरोज़गारी कैसे हमारे समाज को खोखला कर रही है |  

इसी बीच पिताजी के व्यवसाय में बहुत नुकसान होने के कारण काफी तंगी भरा समय आया व कक्षा नौ के बीच में ही मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। हम लोग देहरादून शिफ्ट हो गए | यहां  दिन रात मेहनत करके मैंने जिंदगी की नई शुरुआत की । काम के साथ साथ दसवीं का फॉर्म ओपन बोर्ड से भरा। और धीरे धीरे अपनी शिक्षा पूरी करके अपने पैरों पर खड़ा हो गया | 

वह मेरी शिक्षा ही थी जिसकी वजह से  मैं समझ पाया कि  कैसे कुछ बच्चे शिक्षा के अभाव में  भीख मांगते  हैं | अपनी स्कूली शिक्षा के वक्त के उस सोशल क्लब को याद करके मैंने अपनी एक संस्था की स्थापना की और इन बच्चों को इन्हीं की बस्तियों में शाम के समय जाकर पढ़ाने लगा |  चौदह  वर्षों  से मैं  बच्चों को निः शुल्क शिक्षा दे रहा हूँ । मेरी शिक्षा ने मुझे स्वामी विवेकानंद एवं अब्दुल कलाम जैसे दिग्गजों  से परिचित  कराया | मैं उन्ही के बताये रास्तों पर चलते हुए आगे बढ़ना चाहता हूं और समाज में फैली हुई नफरतों को मिटाकर  अमन का बीज बोना चाहता हूं ताकि फिर कोई 2 साल का बच्चा सांप्रदायिक वैमनस्य का शिकार न हो |

  (लेखक सम्पर्क में डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम मैनेजर हैं | यह विचार उनके अपने हैं | )