04 October 2019

शिक्षक जो बनाए स्कूल की दुनिया मजेदार

कान्ता जी अपने विद्यार्थियों के साथ
By स्पार्क सुदर्शन धिरटा

पढ़ाई में दिलचस्पी होते हुए भी बचपन में मुझे स्कूल जाना कभी पसंद नहीं था | मेरे माता पिता चाहते थे कि मैं शिक्षा ग्रहण करूँ और इसके लिए वे हरसंभव मेरी मदद करते रहे | फिर भी स्कूल जाना मेरे लिए किसी यंत्रणा से कम नहीं था | 

वर्तमान में मैं शिक्षा के क्षेत्र में ही सक्रिय हूँ | ज़ाहिर है मुझे स्कूलों का दौरा करने और शिक्षकों से मिलने के अनगिनत अवसर मिलते रहते हैं | इस दौरान मुझे बहुत से ऐसे शिक्षक मिले जो अपने काम के प्रति इतने समर्पित हैं कि  किसी भी तरह की ढांचागत अथवा बुनियादी सुविधाओं की कमी उनके राह का रोड़ा नहीं बन सकती | ये शिक्षक अपनी कक्षा प्रक्रिया में इतनी ऊर्जा का संचार करते हैं कि बच्चों के लिए 'सीखने की प्रक्रिया ' स्वतःस्फूर्त हो जाती है | अपने पेशे के प्रति ये इस हद तक जुनूनी हैं कि इनका साथ औरों को भी जुनूनी बना देता है |

हाल ही में मुझे ऐसी  ही एक शिक्षिका  कांता भूषण शर्मा से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ | वे 17 वर्षों से शिमला के चोपाल में केंद्रीय प्राथमिक विद्यालय में सेवारत हैं | उनका मानना है कि बच्चों की शिक्षा में शिक्षक और अभिभावक दोनों की ही बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है | जहाँ तक शिक्षा हासिल करने के प्रति बच्चों में रूचि जागृत करने का सवाल है, उसके लिए भी शिक्षक और अभिभावक दोनों को मिलकर ही काम करना होगा |

ये शिक्षक अपनी कक्षा प्रक्रिया में इतनी ऊर्जा का संचार करते हैं कि बच्चों के लिए 'सीखने की प्रक्रिया ' स्वतःस्फूर्त हो जाती है | अपने पेशे के प्रति ये इस हद तक जुनूनी हैं कि इनका साथ औरों को भी जुनूनी बना देता है |

एक शिक्षक के रूप में वह अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए बहुत से 'शिक्षण -अधिगम सामग्री (टीचिंग -लर्निंग मटीरियल ) का उपयोग करती हैं | जरुरत पड़ने पर वे प्रोजेक्ट आधारित कार्य भी बच्चों से करवाती हैं | अपने शिक्षण अधिगम सामग्री और प्रोजेक्ट्स के लिए वे अपने पुराने विद्यार्थियों की भी  मदद लेती हैं | 'करके सीखना ' ( लर्निंग बाई डूइंग ) के सिद्धांत पर  उनका पूरा भरोसा है और वे मानती हैं कि इस  पूरी प्रक्रिया के दौरान हर किसी को कुछ न कुछ सीखने का मौका मिलता है | अपना एक अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह 'कबाड़ से जुगाड़' की अवधारणा के इस्तेमाल से एक प्रोजेक्ट बनाते हुए उन्होंने पाँचवी कक्षा के बच्चों के साथ ग्लोबल वार्मिंग जैसी जटिल अवधारणा को बहुत ही आसानी  साझा किया | इस संपूर्ण प्रक्रिया में बच्चे ग्लोबल वार्मिंग के हर पहलू को अच्छी तरह से समझ पाए और बड़ी ही सहजता और आत्मविश्वास के साथ अपना प्रोजेक्ट सबके समक्ष प्रस्तुत करने में सक्षम हुए |

शिक्षा के क्षेत्र में जिस बदलाव की हम उम्मीद कर रहे हैं, वह ऐसे ही शिक्षकों के द्वारा संभव है | 

राजेंद्र सिंह चौहान भी एक ऐसे ही शिक्षक हैं | वे केंद्रीय प्राथमिक विद्यालय, कुपवी, शिमला, के प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं | वे इसी वर्ष फरवरी माह में इस स्कूल में आए और छह महीनों में ही पूर्व प्राथमिक में में बच्चों की संख्या में छह  गुना 11 से 68 और प्राथमिक में दोगुने से भी अधिक 40 से 87, की बढ़ोत्तरी दर्ज करवाने में सफल हुए  | स्कूल का प्रभार संभालते ही सबसे पहले उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि अभिभावक अपने बच्चों को किन उम्मीदों के साथ स्कूल भेजते हैं ? इसके लिए उन्होंने अभिभावकों के साथ बैठकें की | समुदाय के लोगों से जानकारियां एकत्रित कीं और इस नतीजे पर पंहुचे कि  लोग अंग्रेजी माध्यम का स्कूल चाहते हैं | इसके लिए उन्होंने प्रयास करना भी शुरू कर दिया और सम्बंधित अधिकारियों तक अभिभावकों की बात पँहुचाई | उन्होंने अधिकारियों  को सुझाव दिया कि स्कूल को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में तब्दील कर दिया जाना चाहिए | चौहान अपनी कार्यशैली कुछ इस तरह बयाँ करते हैं, "स्कूल में बच्चों का नामांकन और उनकी उपस्थिति बढ़ाने के लिए हमने कड़ी मेहनत की और शिक्षण प्रक्रिया को इंटरैक्टिव भी बनाया |"

ख़ास बात ये है कि वे बच्चों के माता पिता, खासकर माँ के साथ लगातार संपर्क में बने रहते हैं और बच्चों के विकास में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका से उन्हें परिचित कराने के लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं | इसी कड़ी में इस वर्ष शिक्षक दिवस पर  उन्होंने स्कूल में शिक्षा पर एक व्याख्यान आयोजित किया जिसे सुनने के लिए नब्बे प्रतिशत अभिभावक उपस्थित थे|  

सम्पर्क फाउंडेशन के द्वारा मुझे ऐसे अनगिनत जुनूनी शिक्षकों से मिलने का अवसर मिलता रहता है जो मेरे इस विश्वास को और दृढ़ता प्रदान करता है कि केवल शिक्षक ही बच्चों के स्कूल के अनुभवों को मजेदार और रुचिकर बना सकते हैं|