13 December 2019

शिक्षकों का उत्साह

रंजीत कुमार
By रंजीत कुमार

मैं सोशल सेक्टर में १५ वर्षो से काम कर रहा हूँ और मैंने हिंदुस्तान के ग्रामीण क्षेत्रों  को बहुत करीब से देखा है।  तीन साल पहले जब मैं संपर्क से जुड़ा तोह मेरा पूरा रुझान शिक्षा की तरफ हो गया। मेंने शिक्षा के स्तर को प्रभावित करने वाली सारी समस्याओं पर  काफी अध्यन किया । हमारे देश में बहुत से कारणो की वजह से शिक्षा प्रभावित होती है--ख़राब शिक्षा शास्त्र, स्कूलों में शिक्षक का न होना, शिक्षक का अकुशल होना, स्कूलों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी।  

इन सब कारणों में शिक्षकों का अकुशल होना या अनुत्साहित होना सबसे बड़े कारणों में आता है। परन्तु मुझे ऐसा लगता है की कभी कभी हम कारण  के पीछे के कारणों को नहीं जान पाते और अपने शिक्षकों को दोष दे देते हैं।  मैं इन सालों में बहुत से ऐसे शिक्षकों को मिला जो अपने काम को पूरी ईमानदारी और निष्ठां के साथ कर रहे हैं।  उनमे से एक थे प्रद्युमन कुमार चौधरी।  में एक दिन यूँही बिन बताये इस स्कूल में पहुंचा जहाँ एक निर्वति समारोह चल रहा था। वहां एक शिक्षक बहुत उत्साहित दिख रहे थे, वह सारा काम बहुत शुद्धता के साथ कर रहे थे।  पता चला की यह उन्ही का निर्वति समारोह है।  उनसे मैंने उनके उत्साह का राज़ पूछा तोह हस कर बोले "मैंने अपनी सारी उम्र ऐसे ही काम किया है, और जब तक करूंगा इतने ही उत्साह के साथ करूंगा।"

इसे ही उत्साहित शिक्षकों का एक समूह मुझे दुमका में भी मिला।  जब मैं स्कूल पहुँचा  तोह  ऐसा प्रतीत होता था कि मनो स्कूल बंद है।  बाहर कोई चहल पहल नहीं थी , एक भी बच्चा नहीं था।  मैं लौटने लगा तोह मेरी नज़र कतार में खड़ी साइकिल पर पड़ी।  अंदर गया तोह मेरे कदम रुक गए, सारी कक्षाएं विद्यार्थीयों से भरी थीं और सब बच्चे पढ़ाई में लींन थे।  अध्यापक भी पुरे उत्साह से पढ़ा रहे थे। यह द्रिश्य देख कर मैं प्रफुल्लित हो गया।  

इन अध्यापक से मिला तोह जाना की हमारे गावों के स्कूलों में बच्चो और अध्यापको के बीच  एक अलग सा रिश्ता होता है। वह एक दूसरे को जयादा अच्छे से समझते हैं और आगे बढ़ने में मदद करते हैं इसलिए भी की वे जीवन में एक से सघर्ष को झेलते हैं । अगर ऐसे में कुछ शिक्षक अपना काम ठीक से नहीं करते या किसी कारण वश नहीं कर पाते , तोह हमे ये जानना चाहिए की वह ऐसा क्यों कर रहे हैं।  कभी कभी वास्तविकता कुछ और ही होती है।

मैं ऐसे ऐसे गाओं में गया हूँ जहाँ पक्की ईमारत  केवल स्कूल की है।  लोग गरीबी से जूझ रहे हैं। जिंदगी एक जंग जैसी है फिर भी अपने बच्चो को पढ़ने के लिए भेजतें हैं।  शिक्षक भी बहुत मेहनत करते है। और यह सब एक उज्जवल भविष्य के सपने के लिए किया जाता है। मेरी मानिये तोह इनको प्रोत्साहन की आवश्यकता है।  

जब मैं इन शिक्षकों को संपर्क का किट देता हूँ, ग्रामीण प्रदेश में चलने वाली टेक्निक देता हूँ, तोह ख़ुशी मिलती है की मैं भी इनके संघर्ष में जुड़ गया हूँ। हमारे किट एवं शिक्षण विधि लाखों शिक्षको कक्षाओं को मज़ेदार और प्रभावी बनाने  में मदद करती हैं।  

(लेखक संपर्क फाउंडेशन में झारखण्ड के स्टेट हेड हैं।  विचार इनके अपने हैं।)