28 January 2020

और इस तरह से मैनें पाई गणित पर जीत

By दुर्गा प्रसाद यादव

हर बार मेरे शिक्षक जब मुझे ब्लैक बोर्ड पर गणित के सवाल हल करने को कहा करते थे , मुझे घबराहट होने लगती थी। वैसे तो मैं ज्यादातर विषयों में अच्छा था, लेकिन गणित का नाम सुनते ही मेरे पसीने छूट जाते थे। 
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि मेरे गणित के अध्यापक मुझे सबसे ज्यादा निराशा जनक और कमजोर छात्र कहकर कोसते रहते थे। गणित में कमजोर होने के कारण मेरे सहपाठी भी मेरा मजाक उड़ाया करते थे।   
विद्यालय में मेरी स्थिती इतनी खराब हो चुकी थी कि अब मैने कक्षा में जाना बंद कर दिया था।  समय बिताने के लिए मैं पूरे शहर में घूमा करता था। तभी एक दिन मेरी नज़र पास ही के एक विद्यालय पर गयी, क्योंकि सभी सरकारी विद्यालयों की पोशाक एक जैसी ही होती है एक दिन मैं वहां गया और चुपचाप कक्षा में बैठ गया।  कक्षा में अध्यापक ने मेरा स्वागत किया और अचानक नया चेहरा देखकर भी मुझसे ज्यादा सवाल नहीं किए।  मुझे मेरी नयी कक्षा , सहपाठी  और वहां का वातावरण पसंद आया।  धीरे-धीरे मैं रोज ही उस विद्यालय में जाने लगा।  


जब मेरे माता-पिता को ये पता चला कि मैं कई दिनों से अपने विद्यालय नहीं जा रहा तो वो बहुत नाराज हुए।  मेरे पिता ने मेरी जमकर पिटाई की और मुझे वापस मेरे विद्यालय भेज दिया।  मेरे पिता ने मुझे रोचक तरीके से पहेलियों के ज़रिए गणित पढ़ाने की कोशिश की पर इसका कोई फायदा नहीं हुआ...गणित के साथ मेरा संघर्ष अनवरत चलता ही रहा।   

मैं सचमुच पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ना चाहता था। लेकिन दूसरे विद्यालय से जुड़ी कुछ अच्छी यादों ने मुझे हौसला दिया कि क्यों न पढ़ाई छोड़ने के पहले एक बार माध्यमिक स्कूल जाकर देखें। प्राथमिक विद्यालय केवल कक्षा पांच तक ही होता है और अब मुझे माध्यमिक विद्यालय जाना था। अब मेरा दाखिला दूसरे विद्यायल में हो चुका था। 

माध्यमिक विद्यालय में मेरी  नई अध्यापिका ने गणित के  प्रति मेरे इस डर का असली कारण समझा।  मेरी अवधारणाएं स्पष्ट नहीं थी।  उन्होंने मुझे कहा कि मुझे गणित से डरने की जरुरत नहीं और अगले 6 महीने तक मैं सिर्फ उनके निर्देशों का पालन करुं। 

सबसे पहले उन्होंने मुझे कहा कि हर अभ्यास को करने के पहले उससे संबंधित उदाहरणों को देखो, ध्यान से समझो और उसके बाद सम्बंधित प्रश्न को ध्यान से पढ़ो, फिर खुद को और अपने दोस्तों को केंद्र में रखकर अपने दिमाग में समस्या की कल्पना करो और ऐसा सोचो  कि असल जिंदगी में इस समस्या का समाधान कर रहे  हो।  इसके अलावा उन्होंने गणित के सूत्रों को याद करने के लिए कुछ सुझाव भी दिए। 

धीरे-धीरे गणित मुझे अच्छी लगने लगी। अब मुझे ना तो गिनती से डर लगता था न गणित के चिन्हों से और न ही सूत्रों से।  
मेरी दसवीं की मार्कशीट देखकर मेरे माता-पिता आश्चर्यचकित थे।  मैं जो कक्षा पांच का सबसे निराशा जनक छात्र था, दसवीं में गणित में  96% अंक लाया था।  
 
जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ मुझे समझ में आया कि गणित का डर बच्चों में आम है जिसकी वजह है अप्रभावी शिक्षण और दोषपूर्ण पाठ्यक्रम, जो अनुभव के आधार पर नहीं बल्कि रटकर सीखने को बढ़ावा दे रहा है। 

आज मैं दूसरे बच्चों के सीखने के तरीकों को रोचक बना रहा हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि हर छात्र के लिए शुरुआती शिक्षा की नीव मजबूत होनी चाहिए।  और अब जब मैं अपने हाथों में सम्पर्क फाउंडेशन की नीली गणित किट लेता हूं तो अपने आपको बहुत सशक्त महसूस करता हूँ।  

सम्पर्क में हम वैसा ही कर रहे हैं जैसा वर्षों पहले मेरे अध्यापक ने मुझे सिखाया था लेकिन और अधिक वैज्ञानिक  तरीके से। यहां, हमारे शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य अवधारणा के पीछे "क्यों" की कल्पना करके कक्षा में बच्चों को प्रेरित करने के तरीके पर ध्यान केंद्रित करना हैं। हम मैथ में कंक्रीट से एब्सट्रैक्ट यानि मूर्त से अमूर्त मेथडोलॉजी और बहुत सी शिक्षण अधिगम सामग्री (टीएलएम) का उपयोग करते हैं ताकि जटिल अवधारणाओं को सरल तरीके से पढ़ाया जा सके।

गणित पढ़ाने के ये तरीके इतने प्रभावी हैं कि मैं अक्सर अपने आठ साल के बेटे, तनिष्क, को जटिल गणित अवधारणाओं को समझाने के लिए उनका उपयोग करता हूँ।  मुझे पता है कि अगर वह किसी समस्या के 'क्यों' का जवाब देना सीखता है, तो वह इससे कभी नहीं डरेगा।
 
सम्पर्क में काम करना मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि हम लाखों बच्चों को गणित के डर, हव्वे और चिंता से निपटने में मदद कर रहे हैं। और मुझे तब-तब बहुत गर्व महसूस होता है जब कोई बच्चा आत्मविश्वास से क्लास में खड़ा होता है और खुद आत्मविश्वास के साथ ब्लैकबोर्ड पर गणित के सवाल हल करता है। 

(लेखक सम्पर्क फाउंडेशन हरियाणा के स्टेट हेड, हैं  व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं)