05 February 2020

शिक्षा और पारस्परिक सहयोग की सफल कहानी

By श्री सुधीश कुमार

2013 में किए गए नेशनल अचीवमेंट सर्वे के दौरान छत्तीसगढ़ के नतीजे चौका देने वाले थे। ये सर्वे देश भर में किए गए थे जिसमें छत्तीसगढ़ के स्कूली बच्चों में सीखने की क्षमता सबसे कम पाई गयी।  यहाँ 10 में से 6 बच्चे ऐसे थे जो ठीक से सामान्य पाठ भी पढने में भी सक्षम नही थे और न ही गणित के सरल सवाल हल कर सकते थे|

सर्वे में आए परिणाम से ये तो समझ में आ ही गया था बच्चों की नींव ही कमजोर थी और उन्हें बुनियादी शिक्षा और ज्ञान की जरुरत थी।  

राज्य सरकार के लिए ये बहुत बड़ी चिंता का विषय था। अब सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरुरत थी...शिक्षा नीति में सुधार की जरुरत थी। 

इसी क्रम में चार वर्षीय ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम गुणवत्ता अभियान शुरू किया गया जिसका लक्ष्य स्कूली शिक्षा में सुधार था। इस अभियान के तहत हमें स्कूलों में सामाजिक सर्वेक्षण कर कमजोर स्कूलों को सबसे पहले चिन्हित करना और उनकी कमजोरियों पर काम करना था। 

हमने इस मूल्यांकन कार्य में ग्राम सभाओं का भी सहयोग लिया। हमने उन सभी कारको और कारणों को समझने की कोशिश की जो कि बच्चों की सीखने की समझ को प्रभावित कर रहे थे। इस मुल्यांकन कार्य के दौरान जो सबसे बड़ी कमी उभर कर सामने आई वो थी बच्चों को पढ़ाने और सीखाने के प्रति टीचर्स की उदासीनता | शिक्षक बच्चों को पढाने में ज़रा भी रुचि नहीं ले रहे थे...

इससे हमें एक बात तो समझ में आ गयी थी कि सरकारी स्कूलों में खाली पदों को भरने के लिए अस्थाई शिक्षकों की नियुक्ति की गयी है  | स्थाई शिक्षकों की तुलना में अस्थायी शिक्षक कहीं ज्यादा मेहनत कर रहे थे लेकिन कम वेतन उनकी कक्षाओं को प्रभावित कर रहा था | हमने महसूस किया कि शिक्षकों को उत्साह और सकारात्मक रवैये की बहुत जरूरत थी ।

क्योंकि शिक्षक ही हमारे शिक्षा प्रणाली की रीढ़ हैं | इसलिए, सरकार ने उनके लिए वेतन में सुधार करने का फैसला किया, साथ ही साथ हम शिक्षकों के लिए एक ऐसा एजुकेशनल प्रोग्राम शुरु करने की सोच रहे थे जिसके अंतर्गत उन्हें प्रशिक्षित करने ,कौशल विकास,नयी नयी तकनीक सिखा सकें, जिससे वो अपनी टीचिंग का आनंद ले सके और पूरी रुचि के साथ बच्चों को पढा सके|     

उसी समय हमें सम्पर्क फाउंडेशन से एक प्रस्ताव मिला। सम्पर्क फाउंडेशन पूरे राज्य में सभी सरकारी प्राथमिक स्कूलों में अपनी स्मार्ट शाला कार्यक्रम को लागू करना चाहता था। उन्हें विश्वास था कि उनका कार्यक्रम बच्चों के बीच सीखने की क्षमता को बेहतर बनाने में हमारी मदद कर सकता है और वे शिक्षकों को उत्साहित, सशक्त और सक्षम बनाकर ऐसा करना चाहते थे। वास्तव में सम्पर्क  की योजना वैसी ही थी जैसी राज्य सरकार सोच रही थी...
उनके प्रस्ताव का मूल्यांकन व्यावहारिक, दृष्टिकोण उपयोगिता, लागत, और बजट समझने के बाद एक दूसरों के बीच-हमने उनके साथ सहयोग करने का फैसला किया।


मेरा मानना है कि किसी भी साझेदारी की शुरुआत तभी होती है जब दोनों साझेदार उद्देश्य के प्रति समर्पित हों | सम्पर्क के पास उद्देश्य के प्रति समर्पित फिल्ड रीप्रेजेंटेटिव हैं जिन्हें वो स्पार्क कहते हैं|जो बुनियादी बदलाव लाने के लिए काम करते हैं। उनका प्रयास होता है कि किस तरह से नए-नए कम लागत के प्रभावी टूल्स या तरीके ढूढें जायें जिससे एजुकेशन को रोचक और प्रभावी बनाया जा सके ।

कार्यक्रम ने न केवल कक्षाओं में शिक्षकों और बच्चों के सामने आने वाली समस्या की पहचान करने में सरकार की मदद की है, बल्कि बच्चों के लिए सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने में भी बहुत योगदान दिया है।
आज, शिक्षकों के साथ निरंतर मुल्यांकन और बातचीत के माध्यम से हम सफलतापूर्वक व्हाट्सएप पर शिक्षकों का एक समुदाय बनाने में कामयाब हुए हैं जिनके साथ हम नियमित रूप से बातचीत करते हैं। शिक्षकों को भी, अपने विचारों और समस्याओं को साझा करने के लिए एक मंच मिला है।

सम्पर्क के कार्यक्रम के बारे में मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद है, वह यह है कि वे इसे शिक्षकों और सरकार से मिले फीडबैक के आधार पर नियमित अंतराल पर अपग्रेड करते रहते है।
हमने प्राथमिक स्कूलों में अपने बच्चों के लिए सीखने के परिणामों में सफलतापूर्वक सुधार किया है।एक शिक्षाविद् के रूप में, मेरा उद्देश्य हमारे स्कूलों में वातावरण को सीखने के लिए अनुकूल बनाना है और मैं उस दिशा में हर कदम का स्वागत करता हूं।

(लेखक छत्तीसगढ़ के सहायक संचालक, शिक्षा शास्त्र हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं)