11 February 2020

शहर और गाँव के बच्चों की मानसिक क्षमताओं में कोई अंतर नहीं है: ममता मिश्रा

ममता मिश्रा अपने स्कूल के बच्चों के साथ
By सम्पर्क फाउंडेशन

ममता मिश्रा, उत्तर प्रदेश के चाका ब्लॉक के एक प्राथमिक विधालय की अध्यापिका हैं।  इनका मानना है कि बच्चो को पढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका होता है उन्हें खेल - खेल में पढ़ाना।  ममता ने अपने नवाचारों की मदद से इनके स्कूल में पढ़ने वाले बच्चो के सीखने के प्रतिफलों में काफी सुधार  लायी हैं।  पिछले कुछ वर्षो से यह अपने नवाचारों और क्लासरूम एक्टिविटीज को यूट्यूब अवं फेसबुक के माध्यम से लोगो तक पहुंचा रही है, यह कॉस्ट-इफेक्टिव नवाचार इतने प्रसिद्ध हो गए हैं की ममता के फेसबुक पर 8 लाख और यूट्यूब पर 5 लाख से भी अधिक फॉलोवर्स हैं।  सम्पर्क फाउंडेशन के साथ बात चीत में ममता ने अपने सघर्षों  और  नवाचारों के बारे में  बताया

1. आप शिक्षिका क्यों बनी?

मेरी माँ एक प्राइवेट विद्यालय में शिक्षिका हैं,उन्हें बचपन से ही बड़े परिश्रम, निष्ठा व ईमानदारी से अध्यापन करते हुए काफी करीब से देखा है तो बचपन में ही उन्ही को अपना आदर्श मानते हुए शिक्षिका बनने का निश्चय कर लिया था।

2. आपके विचार में गाँवों में शिक्षा का स्तर इतना कम क्यों है?

शिक्षा का तात्पर्य बच्चे के समग्र व समावेशी विकास से है और गाँव के परिवेश में ऐसे बहुत से कारक आज भी विद्यमान हैं जो बच्चों को इस दिशा में प्रभावित करते है, इसके अतिरिक्त परिवेश, परिजनों के शैक्षिक स्तर, जागरूकता, व्यवसाय, आर्थिक स्तर, संसाधन तथा जीवन यापन के क्रम में अपेक्षाकृत भिन्नता व ग्रामीण परिवेश के बच्चों की बचपन से ही घर-परिवार, खेत खलिहान तथा पशुओं आदि के प्रति श्रमसाध्य जिम्मेदारियां इसका बहुत बड़ा कारण है अन्यथा गाँव में प्रतिभाओं की कमी नहीं है।

3. तो आपने यह कैसे किया?

प्रारम्भ में इस दिशा में मुझे भी कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि बच्चे नियमित विद्यालय नहीं आते थे, कारण जानने पर पता चला कि सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे निम्न आर्थिक तबके से आते हैं,उनके कन्धों पर घर,खेत-खलिहान,पशु चराने, व्यवसाय, फेरी अथवा दुकान आदि लगाने की जिम्मेदारियां होती हैं,लड़कियों को भी अक्सर घर व खेत के कामों में हाथ बंटाने अथवा छोटे भाई-बहनों की देखभाल के लिए घर में रुकना पड़ता था। 

उपरोक्त सभी सम्भव कारणों को जानने के पश्चात मैंने बच्चों के परिजनों से शिक्षा के महत्त्व व वांछनीयता पर बात की व उन्हें भी प्रेरित करते हुए बच्चों की शिक्षा के साथ परोक्ष रूप से जोड़ा। बच्चों को विद्यालय में पढ़ाई गई विषयवस्तुओं व विभिन्न प्रयोगों, ज्ञान-विज्ञान की बातों आदि को अपने परिजनों/अभिभावकों से बताने व प्रश्न पूछने हेतु प्रेरित किया, इसी क्रम में खेल खेल में शिक्षा देना भी प्रारम्भ किया,इसके अतिरिक्त समय-समय पर विद्यालय में आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान बच्चों के अभिभावकों विशेषतया उनकी माताओं को आमंत्रित कर न सिर्फ उन्हें समान्नित किया बल्कि उनके बीच भी विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं के माध्यम से उन्हें भी विद्यालय से जोड़ने में सफलता प्राप्त की।

4. आपने शहर और गाँव दोनों ही जगह पढ़ाया है,क्या अंतर है बच्चों में?

शहर और गाँव के बच्चों की मानसिक क्षमताओं में कोई अंतर नहीं है,अन्तर है तो बस उनके परिवेश,परिजनों के शैक्षिक स्तर,जागरूकता, घर-परिवार के प्रति जिम्मेदारियों, आर्थिक स्तरों, संसाधनों व प्राथमिकताओं आदि में लेकिन विभिन्न सरकारी व व्यक्तिगत प्रयासों के चलते अब ग्रामीण परिवेश के परिजन व बच्चे दोनो ही दिनों-दिन जागरूक व प्रेरित हो रहें हैं।

 

5. आपको अपने नवाचारों को यूट्यूब और फेसबुक के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

आरंभिक अध्यापन के दौरान मुझे कई प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना पड़ा जैसे बच्चों का नियमित विद्यालय न आना, उनके विभिन्न अधिगम स्तर व उनकी कुछ अन्य मानसिक, शारीरिक, सामाजिक व आर्थिक भिन्नतायें/बाधायें जिसके चलते मैंने सम्बन्धित कारणों/कारकों पर गहन विश्लेषण,अनुसंधान,बच्चों के सीखने की क्षमता विशेष आदि के आधार पर नई-नई गतिविधियों का निर्माण किया,इस दिशा में मैंने विभिन्न शिक्षकों/विशेषज्ञों व मनोवैज्ञानिकों से चर्चा-परिचर्चा की,विभिन्न देशों के विद्यालयीय शैक्षणिक व शिक्षणेत्तर क्रियाकलापों व बाल-मनोविज्ञान आधारित विभिन्न पुस्तकों का गहन अध्ययन-विश्लेषण आदि कर इन समस्याओं का बहुत हद तक व्यक्तिगत स्तर पर समाधान करने का प्रयत्न किया।इस दिशा में मेरी सफलता को देखते हुए कई शिक्षक साथियों व अभिभावकों ने मुझसे मेरे प्रयासों/नवाचारों व गतिविधियों की निरन्तर मांग की जिस हेतु मैंने डिजिटल प्लेटफॉर्म व सोशल मीडिया का सहारा लिया।

6. आपको लोगों के द्वारा सराहना मिलने पर कैसा लगा?

बतौर आम शिक्षिका मेरे लिए यह अत्यंत विस्मय,हर्ष व गौरव का विषय है कि लोगों ने न सिर्फ मुझ पर अपना विश्वास जताते हुए मेरे कार्यों व प्रयासों को सराहा बल्कि उन तरीकों/प्रयासों को अपनाते हुए अपने बच्चों,शिष्यों व शिक्षण में भी बेहतर परिणाम हासिल कर रहे हैं।आज देश-विदेश के करोड़ों दर्शकों से लगातार सकारात्मक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हो रही हैं,विभिन्न संस्थागत शैक्षणिक-शिक्षणेत्तर कार्यक्रमों,विचार-गोष्ठियों, सम्मेलनों आदि से निरंतर आमंत्रण मिल रहे हैं।मैं अपने शुभचिंतकों व प्रशंसकों की हृदयतल से बहुत-बहुत आभारी हूँ जिन्होंने मुझे अपना विश्वास,स्नेह व साथ दिया,आपके माध्यम से उन्हें यह सन्देश देना चाहती हूँ कि आप सभी की सकारात्मक प्रतिक्रियायें व साथ मेरी ऊर्जा व प्रेरणा का स्रोत है और ईश्वर से यही कामना है कि वह इसी प्रकार मुझे आपके विश्वास पर हमेशा खरे उतरने का सामर्थ्य व सम्बल प्रदान करते रहें।