13 February 2020

पीयर-टू-पीयर लर्निंग पढ़ाने का एक प्रभावी साधन है: निधि जैन

निधि जैन कक्षा में पढ़ाती हुई
By निधि जैन

बचपन में मुझे स्कूल जाना बहुत अच्छा लगता था।  मेरे अध्यापक बहुत अच्छे थे, वे बहुत प्यार से पढ़ाते थे , खेलने - कूदने के लिए प्रोत्साहित करते और जीवन के कई पहलुओं पर प्रेरणा देते थे।  स्कूल मानो घर जैसा ही था , हमने वहां बहुत सीखा।  

उनके व्यवहार का मुझ पर इतना प्रभाव हुआ कि मैं बिलकुल उन जैसी बनना चाहती थी। मैंने तय कर लिया था कि मैं बड़े होकर टीचर ही बनूंगी।  

आज मुझे शिक्षिका बने 20 वर्ष से अधिक हो गए और आज भी मुझे स्कूल आना बहुत अच्छा लगता है।  मैं अपने बचपन की बहुत सी बातें, पढ़ाने के तरीके आज अपने बच्चो पर इस्तेमाल करती हूँ। हमारे टीचर्स हमसे अपने से छोटे बच्चो को पढ़ाने को कहते थे , जिससे हमारे अवधारणाएँ स्पष्ट हो जाती थी, पाठ याद हो जाते थे, और मुश्किल प्रश्न हल हो जाते थे। 

आज मुझे शिक्षिका बने 20 वर्ष से अधिक हो गए और आज भी मुझे स्कूल आना बहुत अच्छा लगता है।  मैं अपने बचपन की बहुत सी बातें , पढ़ाने के तरीके आज अपने बच्चो पर इस्तेमाल करती हूँ। हमारे टीचर्स हमसे अपने से छोटे बच्चो को पढ़ाने को कहते थे , जिससे हमारे अवधारणाएँ स्पष्ट हो जाती थी , पाठ याद हो जाते थे , और मुश्किल प्रश्न हल हो जाते थे। 

आज भी एक दुसरे को पढ़ाना यानी पीयर - टू - पीयर लर्निंग का कांसेप्ट बहुत प्रचलित है इससे बच्चे जयादा सीखतें है और रिटेंशन भी बढ़ता है। हम पीयर - टू - पीयर लर्निंग के माध्यम से बच्चो को पाठ्यक्रम के साथ साथ लाइफ स्किल्स, ड्रेसिंग  सेंस, ग्रूमिंग, हेल्थ और हाइजीन भी बताते है -- जैसे कैसे रहना है, पौष्टिक आहार क्या होता है, क्यों जरूरी होता है, हाथ धोने क्यों जरूरी होते है , आदि। लड़कियों के लिए भी बहुत सी बातें जो वह अपने माता-पिता से नहीं सीख पाती, हम उन्हें स्कूल में बताते हैं।  

कभी-कभी जब वक्त मिलता है तो सोचती हूँ कि मैं कितनी खुशनसीब हूँ -- जो करना चाहती थी वही करने का अफसर मिला, और उसे अच्छे से कर पाऊँ उसके लिए सबका सहयोग मिला, दिशा मिली, प्रेरणा मिली। जितना आदर और सम्मान हमने अपने अध्यापको को दिया, मुझे भी अपने बच्चो से उतना ही आदर, सम्मान और स्नेह मिलता है। ऐसा लगता है मानो जीवन सफल हो गया है। 

(लेखक दुर्ग , छत्तीसगड़ में प्राथमिक विद्यालय में अध्यपिका है।  विचार उनके अपने है।)