09 June 2020

पीढ़ियों के अंतर से शिक्षा पर प्रभाव

By समृद्धि साक्षी

शिक्षा...मेरा मानना है कि यह सिर्फ एक शब्द मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे भविष्य और अगली पीढ़ी की एक मूल-भुत आवश्यकता है और इसी आवश्यकता को समझने के लिए मैंने अपने पिछले 2 वर्ष गुजरात राज्य के  खेड़ा जिले के सरकारी विद्यालयों में  व्यतीत किये । जहाँ मुझे  सरकारी स्कूल के शिक्षकों के साथ काम करने का अनुभव मिला ।
 
इन शिक्षकों में कुछ ऐसे शिक्षक भी थे, जो अगले 4-5 साल में रिटायरमेंट लेने वाले थे। पिछले साल जब गुजरात सरकार ने सरकारी विद्यालयों में NCERT को लागू किया तब जो थोड़े उम्रदार शिक्षक थे उनमें खलबली मच गयी थी। उनका मानना था कि इस पाठ्यक्रम में बहुत ज्यादा गतिविधियों वाले अध्याय हैं, जो ज्यादा समय लेते हैं और जिसके कारण बच्चे भी संभल नहीं पाते और पढ़ाना  मुश्किल हो जाता है।
 
देखा जाये तो वो भी अपने जगह गलत नहीं थे, उनके ज़माने में पढाई-लिखाई का अपना ही तरीका था, जो कहीं न कहीं ब्लैक-बोर्ड, चॉक और कॉपी तक ही सिमित था। जहाँ ज्यादातर शिक्षक अभी स्मार्ट फ़ोन तक प्रयोग नहीं करते, वहां आज के नए दौर की तकनीकि में क़िताबों से बार कोड स्कैन करके बच्चो को पढ़ने-पढ़ाने  की प्रक्रियाएं आ चुकी हैं।

देखा जाये तो वो भी अपने जगह गलत नहीं थे, उनके ज़माने में पढाई-लिखाई का अपना ही तरीका था, जो कहीं न कहीं ब्लैक-बोर्ड, चॉक और कॉपी तक ही सिमित था। जहाँ ज्यादातर शिक्षक अभी स्मार्ट फ़ोन तक प्रयोग नहीं करते, वहां आज के नए दौर की तकनीकि में क़िताबों से बार कोड स्कैन करके बच्चो को पढ़ने-पढ़ाने  की प्रक्रियाएं आ चुकी हैं।

इस परिस्थिति में मैंने खुदको दो पीढ़ियों के बिच में पाया, जहाँ मैं दोनों ही पलड़ों को समझ पा रही थी।और यह भी देख पा रही थी की कैसे दोनों  ही पीढ़ियों में बढ़ते अन्तर का असर वर्त्तमान समय की तकनीकि युक्त पढाई और नई शिक्षा पद्धति पर हो रहा है,  जिससे धरातल पर योजनाएं उतनी सफल नहीं हो पा रही। जिसमे सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझ आयी कि इससे शिक्षकों का मनोबल तो कमजोर पड़ ही रहा है, साथ ही बच्चों के भी प्रारंभिक शिक्षा यानि उनके पढाई की नींव कमजोर होने की संभावनाएं हो रही हैं। 
 
अब यहां सोचने कि बात यह है की क्या पीढ़ियों के अंतर से शिक्षा पर प्रभाव पड़ सकता है?
 
यह हम बचपन से सुनते आए हैं कि बदलाव प्रकृति का नियम है, जो किसी न किसी रूप में होता ही रहता है, फिर वो लोगों के रहन-सहन का हो या फिर शिक्षा पद्धति का। जरुरत है कि अगर हम कोई भी बदलाव कर रहे हैं, तो उसके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाए। उदाहरण के तौर पर शिक्षा पद्धति में किसी भी बदलाव को करने से पहले हमें शिक्षकों और बच्चो की जगह खुद को रख कर देखने की जरुरत है, इस तरह से हम एक बेहतर निर्णय ले पाएंगें। हमें मनोवैज्ञानिक रूप से किसी बुजुर्ग व किसी बच्चे की सोच व उनके कार्य करने के तरीके के रूप में सोचना होगा ।
 
मेरा मानना है कि NCERT का पाठ्यक्रम लाने से पहले शिक्षकों को उसको लागू करने की वजह बताया जाना जरूरी था। हर बार किसी भी बदलाव के लिए उसके 'क्यों' का स्पष्ट होना जरूरी है। साथ ही जरूरी है, उन सभी प्रक्रियाओं का सुनिचित होना, जिससे बदलाव की प्रक्रिया पर सकारात्मक असर आए। बदलाव को सही दिशा में ले जाने के लिए महत्वपूर्ण है समय-समय पर प्रेरणा और प्रशंसा से शिक्षकों का मनोबल बढ़ाया जाना क्योंकि शिक्षक शिक्षा की प्रगती का आधार है।

(लेखक सम्पर्क फाउंडेशन के संचार विभाग मे काम करती हैं, व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं)