09 July 2020

ऑनलाइन शिक्षा पद्दति का आधार हैं अभिवावक...

यतिका जी, अपने घर से बच्चों को पढ़ते हुए
By यतिका पुंडीर

आज समूचा विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है। दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी लॉकडाउन जैसे हालातों से जूझ रही है।इसके चलते सामाजिक, औद्योगिक और आर्थिक संकट गहराने के पूरे आसार हैं तो, वहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी तो इस मुसीबत ने कब्ज़ा कर रखा था। ऐसे में हम शिक्षकों ने कुछ खास प्रयास किये और ज़ोर डाला ऑनलाइन शिक्षा पर ताकि इस लॉकडाउन की परिस्थिति में भी सरकारी स्कूल के बच्चों को शिक्षा और उनकी कक्षा से दूर होने का अहसास न हो।  

यूं तो मैं पहले भी डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देती थी वाट्सप-ग्रुप के जरिये बच्चों के अभिवावको को रोचक वीडियो और अन्य मटेरियल भेज कर।लेकिन यह प्रयास लॉकडाउन के समय में काफी तेज़ी से बढ़ा और सफल रहा  जिसमे, मैं नियमित तौर पर अपनी वीडियो रिकॉर्ड कर के उसमें तरह-तरह के रोचक तथ्य डाल के जैसे- वीडियो में बच्चों के नाम बुलाना, बच्चों की फोटो से स्टीकर बनाना, समय समय पर बच्चों को प्रोत्साहित करना डिजिटल पॉइंट्स या स्टार देकर इत्यादि। जिससे की बच्चों को वीडियो उबाऊं न लगे। और वीडियोस बना कर उनके उनके माता पिता को भेजती थी। कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि  बच्चों के पास स्टेशनरी के सामान ख़त्म हो गये मैंने वो भी बच्चों तक पहुंचाया जिससे की उनका मन लगा रहे। 

मैं प्रतिदिन ही एक कोरोना महामारी से सम्बंधित एक छोटी वीडियो बना कर भेजती थी जिसमे जानकारी होती थी कि कैसे हाथ धोना है, मास्क घर पर कैसे बनाना है, दो गज की दुरी का पालन करना है , इत्यादि।  जिससे की बच्चों और उनके अभिवावकों में जागरूकता बढ़े और सही सन्देश पहुंचे घर-घर तक।   

मैं प्रतिदिन ही एक कोरोना महामारी से सम्बंधित एक छोटी वीडियो बना कर भेजती थी जिसमे जानकारी होती थी कि कैसे हाथ धोना है, मास्क घर पर कैसे बनाना है, दो गज की दुरी का पालन करना है , इत्यादि।  जिससे की बच्चों और उनके अभिवावकों में जागरूकता बढ़े और सही सन्देश पहुंचे घर-घर तक।   

खैर, इन सब के बिच में एक नारी के रूप में मेरे पास तमाम चुनौतियां भी थी घर-परिवार के साथ मेरे लिए मेरा स्कूल और मेरे बच्चे दोनों ही थे जिन्हे संभालना और समय देना था।ऑनलाइन शिक्षा पदत्ति में बच्चों को शामिल करना और उनके माता-पिता को जोड़े रखना मुश्किल सा था।  लेकिन मेरा मानना है की कोई भी काम मुश्किल हो सकता है, नामुमकिन नहीं और इसी मानसिकता(माइंडसेट) के साथ मैं अपने कार्यों को अंजाम देती हूँ और प्रयास करती हूँ की मेरे आस पास के वातावरण में भी विकसित मानसिकता बनी रहें। 

मेरा मानना है की कोई भी सफलता सिर्फ अकेले के बलबूते पर नहीं होती इसमें किसी न किसी का साथ होता ही है और मैं अपनी इस सफलता का आधार बच्चों के अभिवावकों को मानती हूँ।जिन्होंने बच्चों को मोबाइल उपलब्ध कराया पढ़ने के लिए, समय समय पर दिया हुआ कार्य पूरा कराया,मेरी इस पहल में अपना साथ देकर मुझे इज्जत दिया, मान-सम्मान दिया और इस कठिन परिस्थिति में शिक्षा प्रणाली को अपना अहम योगदान दिया।

(लेखक प्राथमिक विद्यालय की अध्यपिका है।  विचार उनके अपने है।)