31 July 2020

फ़ोन से बांधे रखी है शिक्षा की डोर

प्रियंका जी, अपने घर से बच्चों को पढ़ाते हुए
By प्रियंका

शिक्षक शिक्षा के सारथी होते हैं। पिछले 5 महीने हमारे लिए एक परीक्षा के सामान रहें हैं। कोरोना महामारी के समय में, विद्यालय बंद होने के बावजूद भी हमे बच्चों की पढ़ाई जारी रखनी थी। ये बात तो लगभग सभी जानते हैं कि सरकारी विद्यालयों के ज्यादातर बच्चे गरीब वर्ग से आते हैं, और उनके पास मोबाइल और लैपटॉप जैसी सुविधाएँ नहीं होती हैं। इसलिए ऑनलाइन शिक्षा पद्दति से उनकी शिक्षा को जारी रखना एक बहुत बड़ी चुनौती थी।

लेकिन मेरा मानना है कि हर समस्या समाधान के साथ आती है और इस समस्या का समाधान हमने निकाला 'फ़ोन ट्यूशन' विधि से। जिसमे हमने बच्चों के अभिवावकों से आग्रह किया कि  दिन में कम से कम 1-2 घंटे के लिए वें अपना फ़ोन लेकर अपने बच्चों के साथ बैठे। आस-पास में रहने वाले बच्चें एक साथ एक ही फ़ोन के माध्यम से शिक्षक से जुड़ सकते हैं। साथ में बैठ कर पढ़ने से बच्चों का मन भी लगा रहेगा। यदि माँ-बाप समय नहीं दे सकते तो गांव के किसी बड़े बच्चे को नियुक्त किया जाये ताकि छोटे बच्चे अनुशाशन के साथ पढ़े। साथ ही हमने यह भी सलाह दिया कि मोबाइल फ़ोन के डेटा रिचार्च भी वो सभी अभिवावक मिल-जुल कर देख ले जिससे किसी एक अभिवावक पर भार भी न आये। और जहां स्मार्ट फ़ोन की सुविधा बिलकुल संभव नहीं थी वहां हमने मोबाइल में SMS के जरिये भी बच्चों तक पहुंचने और उनको पढ़ाने की पूरी कोशिश की है।

मैं तो मुख्य रूप से हर मैसेज की शुरुवात कोरोना वायरस के बारे में जानकारी देते हुए करती हूं ताकि बच्चों और अभिवावकों में जागरूकता बनी रहे।

मैं तो मुख्य रूप से हर मैसेज की शुरुवात कोरोना वायरस के बारे में जानकारी देते हुए करती हूं ताकि बच्चों और अभिवावकों में जागरूकता बनी रहे।

हमारी सरकार द्वारा टीवी पर चलाये जा रहे शिक्षा के कार्यक्रम में भी बच्चों को शिक्षा से बांधे रखने में सहायता मिली। इसके अलावा सम्पर्क फाउंडेशन के सम्पर्क स्मार्ट शाला के वीडियोस ने खासा सहायता की बच्चों को रूचि के साथ पढ़ाने में। ऐप में दी गई वर्कशीट और क्विज की सहायता से अवधारणाओं का भी अभ्यास हो पाया।

लोकडाउन के दौरान ही जब मैंने मेरे स्कूल की कुछ बच्चियों को ऑनलाइन पद्दति से पढ़ाने की बात की, तो उन बच्चियों के परिवार वालों ने उन्हें फ़ोन द्वारा पढ़ाई करने की अनुमती नहीं दी। अभिवावकों का मानना था कि बच्चियां इस से बिगड़ जाएंगी। मैंने बहुत से अभिवावकों से बात की, समझाया कि अभी तो उनका भविष्य, उनकी पढ़ाई इस मोबाइल से ही जुड़ा है। कुछ अभिवावकों ने मेरी बात पर ध्यान दिया और मेरा साथ दिया जो मेरे लिए एक सफलता की बात है। मैं अभी तक मेरे विद्यालय में पढ़ने वाले 80 प्रतिशत बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने में सफल रही हूं और बाकि के भी बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का निरंतर प्रयास कर रही हूं।

लोकडाउन के दौरान दिया गया ये शिक्षण मेरे जीवन के अमूल्य अनुभवों में शामिल रहेगा ये अनुभव जिसमें एक शिक्षक के तौर पर टेक्नोलॉजी के साथ-साथ, सामाजिक गतिविधियों को भी समझने-समझाने का अवसर मिला।

एक शिक्षक के लिए सबसे प्रिय उसके छात्र होते हैं और मेरे द्वारा किये गए हर प्रयास की वजह भी ये बच्चें ही हैं।  इन बच्चों का शोर करना, उन्हें पढ़ना, उन्हें कभी प्यार तो कभी सख्ती से समझाना, ये सभी बातें मेरे साथ रहेंगी। अब बस उम्मीद है कि जल्द ही सब ठीक हो जाये और हम सब फिर से अपने स्कूल में, अपने बच्चों से मिल पाएं।

(लेखक प्राथमिक विद्यालय, ब्लॉक हथीन, हरियाणा की अध्यपिका है। लिखे हुए विचार उनके अपने है।)